रविवार, 6 फ़रवरी 2011

शिक्षक


माताएँ देती नव जीवन
पिता सुरक्षा देते है ॥
लेकिन सच्ची मानवता
शिक्षक जीवन में भरते है ॥

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

नारी जीवन झूले की तरह


नारी जीवन झूले की तरह
इस पर कभी उस पर कभी ॥
आँखों में अंसुवन की धार कभी
मन में मधुर मुस्कान कभी ॥

बुधवार, 26 जनवरी 2011

मन मेरा मौसम के जैसा

अब तक के आठ साल के सफ़र में ये पहली बार हुआ क़ि मुझे पता था ये सफ़र मेरा तुम्हारे साथ आखिरी सफ़र होगा ..मन में कोई उत्साह नहीं था बस एक उम्मीद थी , क़ि शायद कही किसी पत्थर में जान पड़ जाए और मुझे वो मिल जाए जो खो गया है...न्यू दिल्ली रेलवे स्टेशन , यूँ तो कई बार साथ जा चुके थे पर पहली बार एहसास हो रहा था यही वो जगह है जहाँ तुम्हे हमेशा के लिए अलविदा कहना होगा ..एक तरफ आँखों से सावन बरसता था और दूसरी तरफ मन में सब पहले जैसा हो जाने क़ि लालसा थी ..और तीसरी तरफ काम कर रहा था दिमाग , मस्तिस्क जो कह रहा था क़ि नहीं मैं अभी इतनी कमजोर नहीं हूँ क़ि उसके आगे झुक जाऊ जो मेरे स्नेह को भुला बैठा है , मेरे आठ साल के साथ को रुसवा कर चूका है ॥ पहली बार एक अनमना सफ़र शुरू हुआ तुम्हारे साथ ..दिल्ली से जम्मू और जम्मू से कटरा...रात भर ट्रेन में जगती रही में , नींद , भूख , प्यास सब कुछ जैसे कोई अपने साथ ले गया था ..उस दिन महसूस हो रहा था क़ि प्यार जैसे कोई चीज इस दुनिया में नहीं होती , क्यूंकि अगर होती तो में आठ सालो में तुम्हारे मन में कही तो घर कर पाती ... खैर जो करने आई थी वो तो करना ही था ..कटरा में एक रूम लिया , वहां नहाये और फिर दरबार क़ि यात्रा शुरू क़ि , मन में ख्याल आया क़ि काश ये सफ़र कभी न ख़तम हो ...पहली बार इतनी शिद्दत से कुछ माँगा इश्वर से ..झोली फैला के .हर सांस के साथ क़ि कुछ ऐसा हो जाये क़ि तुम फिर से मेरे हो जाओ , कोई करिश्मा , कोई चमत्कार , कोई कह दे के बस वो एक भयानक सपना था जो बीत गया ..और तुम आज भी मेरे हो ..पर सचाई तो कुछ और ही थी ..अब किसी ने न कुछ कहना था और न कुछ और सह पाने क़ि ताकत थी ..ये तो एक कर्ज था जो इश्वर से लिया था तुम्हे सलामत रखने को वाही तो उतारने गई थी मैं ..वो पल भी भयानक था जब तुम बीमार थे , बहुत मुश्किल वक़्त था वो जब डॉक्टर आके कह गया क़ि शाम तक हो सकता है तुम्हारा बी.टी करना पड़े ..लेकिन तब भी दिल में इतना दर्द नहीं था जितना आज है ..किसी तरह माता रानी के दर्शन हुए और हम लौट पड़े कटरा के लिए ..थकान से शरीर टूट चूका था पर मन सिर्फ मन्नतो में लगा था ..मुझे अब भी इंतज़ार था , उम्मीद थी कुछ हो जाने क़ि ...वापस रूम पर लौटे ..सोचा थोडा सो लेंगे तो थकान उतर जायेगी पर नींद आँखों का दामन छोड़ चुकी थी , बस बरस रही थी किसी को रोक लेने के लिए ..दोपहर में कुछ खाने और खरीदने मार्केट में आये ..यंत्रचालित सी मैं सब कर तो रही थी पर मेरे भीतर ही भीतर कुछ टूट रहा था ..और मन का कोई कोना अंधकार से भरा जा रहा था ..शाम को फिर जम्मू स्टेशन पहुंचे ..दिल्ली लौटने के लिए पर..पर क्या लौट रहा था मेरे अन्दर पता नहीं ...हम ट्रेन में बैठे और ट्रेन चल पड़ी ...२-३ घंटे क़ि नींद आई मुझे थकान से और फिर आँख खुल गई ..जैसे जैसे ट्रेन दिल्ली क़ि तरफ बढ़ रही थी..मुझे मन ही मन एक डर खाए जा रहा था ..तुम्हे खो देने का ..तुमसे दूर होने का ..मैं तुम्हे रोक लेना चाहती थी ..मन ही मन सोच रही थी ऐसा क्या कह दूँ तुम्हे क़ि तुम रुक जाओ ..पर मेरे यथार्थ का धरातल बहुत दुखदाई था ..तुम और किसी के साथ अपने जीवन क़ि डोर बांध आये थे ...और मेरे मन का प्रश्न ये था , क़ि तुम अपना जीवन किसके साथ बिताना चाहते हो ये यक़ीनन तुम्हारा ही निर्णय होना चाहिए पर तुम्हे मेरा जीवन तबाह कर देने का हक़ किसने दिया ..और जब जब तुम उसकी बात करते तो मुझे लगता जैसे कोई राक्षस मेरी आत्मा को रौंध कर , मेरे बदन को क्रूरता से भ्भोर कर अपने विजयी होने पर अट्टहास कर रहा हो ....देखते ही देखते दिल्ली आ गई और तुम्हारा साथ हमेशा के लिए छुट गया ....मेरा मन जो मौसम क़ि तरह पल पल नए नए रंगों में खिलता था ..हमेशा के लिए पतझड़ में उजड़ी उस शाख क़ि तरह हो गया जिस पर बसंत आने क़ि अब कोई आशा नहीं क्यूंकि ये शाख अपने पेड़ से अलग हो चुकी है ........(कल्पना)

बुधवार, 29 दिसंबर 2010

माँ

सृजन की माला का मनका बनाकर ...कि नारी तन और जीवन देकर कृतार्थ कर दिया ओ माँ तुने ... माँ तुझे सलाम ..

सोमवार, 29 नवंबर 2010

शायद ..

बीती रात कोई मर गया शायद
उजाला बस्ती में कफ़न का कर गया शायद ॥

मौत उसके पीछे न पड़ी थी
बेचारा जिन्दगी से डर गया शायद ॥

नुमाइश को यूँ तो एक जिस्म रखा था
वो भी सुबह तक सड गया शायद ॥

थक कर जिन्दगी के रेलम पेले में
सफ़ेद काफ्दो में सवंर गया शायद ॥

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

बेहतर है ..

जिस तट पर प्यास बुझाने से , अपमान प्यास का होता हो ॥
उस तट पर प्यास बुझाने से , प्यासा मर जाना बेहतर है॥

जब आंधी नाव डूबा देने को
अपनी जिद पे अड़ जाये ,
हर एक लहर नागिन बन के
डसने को फन फैलाये ।

ऐसे में भीख किनारों की मांगना धार से ठीक नहीं,
पागल तुफानो को बढकर आवाज़ लगाना बेहतर है ॥

कांटे तो अपनी आदत के
अनुसार, नुकीले होते है
कुछ फूल मगर कांटो से भी,
जादा जहरीले होते है ॥

जिसको माली आँखे मीचे मधु के बदले विष से सींचे ॥
ऐसी डाली पे खिलने से पहले मुरझना बेहतर है ॥

जो दिया उजाला दे न सके
तम के चरणों का दास रहे
अंधियारी रातो में सोये
दिन में सूरज के पास रहे ।

जो केवल धुंआ उगलता हो, सूरज पे कालिख मलता हो ॥
ऐसे दीपक का जलने से पहले , बुझ जाना बेहतर है ॥

मंगलवार, 28 सितंबर 2010

अश्लील है तुम्हारा पौरुष

पहले वे ..लम्बे चोगो पर सफ़ेद गोल टोपी ॥
पहने आये थे
और
मेरे चहरे पर तेजाब फेककर
मुझे बुर्के में बांध कर चले गए

संस्कृति के रखवाले बन कर आज फिर आये है ॥
एक हाथ में लोहे क़ि सलाखे
और दुसरे में हंटर लेकर

उन्हें शिकायत है ......
औरत होकर मैं
प्यार कैसे कर सकती हूँ ?
सपने कैसे देख सकती हूँ?
किसी को फूल कैसे दे सकती हूँ?

मैंने किसी को फूल दिया
---उन्होंने फूल जैसी मेरी देह दाग दी
मैंने उड़ने के सपने देखे
--उन्होंने मेरे सुनहरे पर तराश दिए
मैंने प्यार करने का दुस्साहस किया
--उन्होंने मुझे वैश्या बना दिया

वे ये सब करते रहे
और मैंने डरती रही , सहती रही ...
---अकेली हूँ न ?

कोई तो आये मेरे साथ
मैं इन हत्यारों को --
तालिब और मुहजिदो को
शिव और राम के सैनिको को
मुहब्बत का गुलाब देना चाहती हूँ॥
बताना चाहती हूँ इन्हें

" न मैं अश्लील हूँ , न मेरी देह ,
मेरी नग्नता भी अश्लील नहीं है ॥
व्ही तो तुम्हे जन्मती है ॥
अश्लील है तुम्हारा पौरुष
--औरत को सह नहीं पाता
अश्लील है तुम्हारी संस्कृति
पालती है तुम से विकृतियों को"

"अश्लील है वे सब रीतिया
जो मनुष्य और मनुष्य के बीच भेद करती है
अश्लील है वे सब किताबे
जो औरत को गुलाम बनती है
और मर्द को मालिक
अश्लील है तुम्हारी ये दुनिया
इसमें प्यार वर्जित है
और सपने निषेद "

वे फिर फिर आते रहेंगे
--पोशाखे बदल कर
--हथियार बदल कर
करते रहेंगे मुझपर ज्यातती
पहले मुझे निवस्त्र करेंगे
और फिर
वस्त्र दान का पुण्य लूटेंगे

वे युगों से यही करते आये है
--फिर फिर यही करेंगे
जब जब मुझे अकेली पाएंगे ॥